जातिवाद को मनुवाद कहकर उसका खण्डन दूसरी ओर जातिवाद के नाम पर आरक्षण को वैध ठहराना दलित राजनीति का विरोधाभासी लक्षण–डॉ रूपक

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एक ओर जातिवाद को मनुवाद कहकर उसका खण्डन करना लेकिन दूसरी ओर जातिवाद के नाम पर आरक्षण को वैध ठहराना दलित राजनीति का विरोधाभासी लक्षण कहा जा सकता है। ऐसी पार्टियां दलित के शोषण और उत्पीड़न के उदाहरण से उनकी भावनाओ को उसका कर उसका नेतृत्व करती है फिर चुनावो मे सफलता पाती है, तथा गठबंधन सरकार मे शामिल होकर अपने कार्यक्रम के बिंदुओ को अमली जामा पहनाती है। अपने हितसाधन की खातिर ऐसे राजनीतिक पार्टियां या संगठन साम्प्रदायिक पार्टियो या संगठन से तालमेल बिठाकर देश की राजनीति मे अस्थिरता और संकट पैदा करती है। ऐसी पार्टियो का अपना कोई वजूद नही होता, ये तो गठबंधन के सम्मीकरण से चुनाव मे कुछ सीटे जीत पाती है। इन पार्टियो मे कोई आंतरिक लोकतंत्र नही होता, जब इन्हे सत्ता मे आने का मौका मिलता है तो ये कार्यकर्ता की जगह परिवार के लोगो को सदन में भेजते है। इनके पार्टी के मुख्य पदो पर परिवार के लोग विराजते है। यहां वन फैमली पॉलिसी होता है यानी एक परिवार ही नीति निर्धारण और निर्णय निर्माण करते है। कैसी बिडम्बना है! आज जब परिवार टूट रहा है तो लोग कह रहे कि पार्टी टूट रही है! (रुपक कुमार सिंह)

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