आनंद मोहन का विरोध करके अपनी पहचान बनाना चाहते है या किसी नेता की दलाली कर रहे है – रुपक कुमार सिंह)

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पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई का मामला जटिल होता जा रहा है, इस प्रकरण मे जो बयान देखने सुनने को मिल रहा है वह भी पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है। चेतन आनंद राजद के विधायक है अतः नीतीश सरकार का विरोध समझ आ रहा है पर जो क्षत्रिय समाज की बात करते है या समाज के बड़े शुभचिंतक है वे लोग नेताजी के खिलाफ और सरकार के पक्ष मे बात कर रहे है यह समझ से परे है। अभी वक्त आरोप प्रत्यारोप या नेताजी से सवाल करने का नही है, बल्कि यह समझना होगा कि सरकार की मंशा नेताजी को जेल मे ही मार देने की है, और यहीं चिंता का विषय है। आज मै किसी पूर्व सांसद के लिए नही बल्कि एक निर्दोष व्यक्ति के लिए लिख रहा हूँ…

आजाद भारत के पहले ऐसे निर्दोष राजनेता जिसे फांसी की सजा सुनाई गई थी, यह ऐतिहासिक घटना थी।
हम निर्दोष इसलिए लिख रहे कि 2007 में कोर्ट ने इन लोगो को दोषी करार दिया था और सजा सुनाया जाना बाकि था तब BBC संवाददाता मणिकांत ठाकुर ने जो न्यूज लिखा वह इस प्रकार था…
“पटना के सत्र न्यायाधीश रामश्रेष्ठ राय ने इस मामले में लालगंज से सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के विधायक मुन्ना शुक्ला, पूर्व सांसद आनंद मोहन और उनकी पत्नी लवली आनंद, पूर्व विधायक अख़लाक अहमद, प्रोफ़ेसर अरूण कुमार सिंह और जद (यू) नेता हरेंद्र कुमार को दोषी करार दिया। सभी दोषियों को तीन अक्तूबर को सज़ा सुनाई जाएगी। जी कृष्णैया की हत्या 4 दिसंबर 1994 को मुज़फ्फ़रपुर ज़िले के खबरा गाँव के पास क्रुद्ध भीड़ ने कर दी थी। ये लोग स्थानीय बाहुबली नेता छोटन शुक्ला की हत्या से नाराज़ थे और इसी के विरोध में जुलूस की शक्ल में आगे बढ़ रहे थे। दोषी करार दिए गए विधायक मुन्ना शुक्ला उन्हीं के छोटे भाई हैं। जी कृष्णैया राष्ट्रीय उच्चपथ पर इस भीड़ में फँस गए और वहाँ मौजूद लोगों ने उनकी गाड़ी पर लालबत्ती देखते ही हमला कर दिया। दोषी करार दिए गए नेताओं के ख़िलाफ़ पुलिस ने भीड़ को उकसाने और ख़ुद हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगाया था। तेरह वर्ष पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा एक वरिष्ठ अधिकारी की इस निर्मम हत्या से सनसनी फैल गई थी।”
अब कुछ सवाल उन लोगो से जो यह कहते है कि यह कोर्ट का मामला है तो उनको बताना चाहता हूँ कि जनता की अदालत से उपर कोई कोर्ट नही है, कोर्ट ने जो करना था किया और कहने को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायालय है पर इन दिनो सरकार के लोग कोर्ट को भी प्रभावित कर रहे है, आप जानते है सरकार के पास स्थायी समिति है उसके माध्यम से या राज्यपाल या राष्ट्रपति के माध्यम से वह चाहे तो सजा को कम करते हुए रिहा कर सकती है। जब इस देश के संसद मे बना कृषि कानून वापस हो सकता है तो आनंद मोहन की रिहाई उससे भी छोटी बात है।
कुछ लोग जो आनंद मोहन की राजनीतिक गलतियों को गिनाने मे लगे है वे वो लोग है जिन्हे लगता है कि वे आनंद मोहन से बड़े क्षत्रिय नेता हो चुके है, जबकि यह हास्यास्पद है, वैसे लोग कभी नही चाहेंगे कि नेताजी जेल से बाहर निकले।
बाकि बचे कुछ लोग ऐसे भी है जो आनंद मोहन का विरोध करके अपनी पहचान बनाना चाहते है या किसी नेता की दलाली कर रहे है। (रुपक कुमार सिंह)
#Justice for #AnandMohan

रिपोर्टर आनंद कुमार सिंह
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