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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नई शिक्षा नीति का जोरदार स्वागत किया-मृत्युंजय कुमार

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नई शिक्षा नीति 2020
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नई शिक्षा नीति का जोरदार स्वागत किया है और यह स्वागत क्यों मैं आपको अवगत कराने का प्रयास करता हूं
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपने स्थापना काल से ही मैकाले शिक्षा नीति का विरोध और भारतीय शिक्षा नीति का समर्थक रहा है, समय-समय पर इस मांग को लेकर विद्यार्थी परिषद आवाज उठाने का काम किया है और वर्षों पुरानी अपनी मांग को मूर्त रूप होता देख अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता काफी खुश हैं!


देश की नई शिक्षा नीति छात्रोंको 21वीं सदी के अनुरूप नए चुनौतियों से मुकाबला करने और नए अवसरों का लाभ उठाने के लिए तैयार करेगी, नई शिक्षा नीति में सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा के भाषा को लेकर किया गया है!
जिससे बच्चों को कक्षा पांच तक उनकी मातृभाषा में ही पढ़ाया जाएगा, आगे छात्र उसी भाषा को कक्षा 8 तक जारी रख सकते हैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता होने के नाते मेरा विद्यार्थियों के बीच रहकर समस्याओं से हमेशा अवगत रहने के कारण मेरा मानना है कि बच्चा सबसे अधिक चीजें अपनी मातृभाषा में ही सीखता है ऐसे में प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही होनी चाहिए।


मैं एक ऐसा छात्र हूं जुआ स्नातक तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम में ही पड़ा है। नई शिक्षा नीति के बाद मैं यह पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि हिंदी को आखिरकार उसका सम्मान मिल रहा है। भारत में खासकर दिल्ली राज्य के अंतर्गत भारतीय भाषाओं को कभी उनका सम्मान नहीं मिला।
मुस्लिम आक्रांता ओं ने फांरसी का परचम लहराया तो अंग्रेजों ने अंग्रेजी का।
मुस्लिम शासकों के पतन के साथ ही फारसी का पतन हो गया लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी का प्रभाव कम ना हो सका।


ऐसा इसलिए क्योंकि आजाद भारत के शासक मैकाले की शिक्षा नीति के उत्पाद थे जिनका रंग तो ब्राउन था लेकिन सोच अंग्रेजों वाली थी।
राष्ट्रीय राजनीति और नौकरशाही को काबू करने के लिए और अपने काबू में रखने के लिए दक्षिण बांबे और सिविल लाइन के लोगों ने समाजवाद के दौर में भी अंग्रेजी को अपने सिर पर चढ़ाए रखा ताकि वंचित और मध्यम वर्गीय युवाओं को अपने काबू में रखते हुए उन पर राज किया जा सके और उनके अंदर हीन भावना पैदा किया जा सके ताकि वह उनके पिछले बने रहे।
इन तथाकथित सभ्य लोगों ने असभ्य लोगों पर राज करने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया था। इसका उदाहरण मैं आपको ताजातरीन इस कड़ी में रवीश कुमार जैसे लोगों का उदय होना जिनमें सब होने की चाह जमकर हिलोरें मार रही है थी।
ऐसे परिस्थितियों में मेरे जैसे वंचित और मध्यम वर्गीय परिवार के जो युवा छात्र जो बचपन से ही हिंदी मीडियम में पढे हैं, हमें इंग्लिश बोलने वालों के सामने कमतर समझा जाने लगा जिससे हमारे जैसे हिंदी भाषी लोगों के अंदर वहीं भावना घर कर गई और या धारणा बन गई की इंग्लिश बोलने वाले ज्यादा स्मार्ट होते हैं और ज्यादा समझदार होते हैं इसलिए हम जैसे छात्र युवा लोग उनसे मुकाबला करने की सोच भी नहीं रही , बस यही होर लगा रहा कि कैसे इन जैसा बना जा सके क्योंकि सफलता की गारंटी इंग्लिश को बना दिया गया इन तथाकथित सभ्य लोगों के द्वारा,


लेकिन आगे चलकर ऐसा एहसास हुआ की अंग्रेजी का समझदारी से कोई लेना देना नहीं है।
यहां से आसाम समझ में आने लगा कि हमारे समाज में अपनी मातृभाषा को अंग्रेजी से ज्यादा नहीं तो उसके समान महत्व देने की आवश्यकता है।
नई शिक्षा नीति । मुझ जैसे लाखों लाखों विद्यार्थियों युवाओं के अंदर से हीन भावना और हिंदी अंग्रेजी के मानव निर्मित भेद को मिटाने का कार्य करेगा।
आज के मध्यमवर्गीय परिवार के छात्रों युवाओं के अंदर जो सोच थी कि अंग्रेजी से बड़े लोग ज्यादा समझदार होते हैं और सफलता उनकी गारंटी होती है और हिंदी वाले नासमझ होते हैं इस मिथक को तोड़ने का कार्य नई शिक्षा नीति जरूर करेगी ऐसा हम सभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं को पूर्ण विश्वास है इसलिए मैं नई शिक्षा नीति का पूरा समर्थन करते हुए पुरजोर स्वागत करता हूं
मृत्युंजय कुमार, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बिहार विश्वविद्यालय, (राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य, अभाविप), बिहार

रिपोर्टर आनंद k

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